महासमुंद/छत्तीसगढ़:
जो सरकारें वातानुकूलित (एसी) कमरों में बैठकर खुद को 'किसान हितैषी' साबित करने का ढोंग रचती हैं, उन्हें आकर ज़मीन पर पसरा यह सन्नाटा और किसान की सूजी हुई आंखें देखनी चाहिए। रबी फसल पर हुई बेमौसम बारिश ने पहले ही अन्नदाता की कमर तोड़ दी थी, और अब जो कसर बची थी, उसे प्रशासनिक नाकामी की छत्रछाया में फल-फूल रहे बिचौलियों ने पूरा कर दिया। आज हालात यह हैं कि खून-पसीना बहाकर उपजाई गई फसल को किसान ओने-पौने दाम में कौड़ियों के भाव बेचने पर मजबूर है। दावों के महल ज़मींदोज़ हो चुके हैं और हकीकत यह है कि तंत्र पूरी तरह पंगु हो चुका है।
आज किसान का खाद-बीज और महंगी दवाओं का लागत मूल्य तक नहीं निकल पा रहा है। बिचौलियों की पौ-बारह है और हमारा अन्नदाता कर्ज के गहरे दलदल में धंसता जा रहा है। 'तीखी नज़र' सीधे छत्तीसगढ़ के ज़िम्मेदार हुक्मरानों से यह सवाल पूछती है कि आखिर कब तक इस खुली लूट को मूक सहमति दी जाएगी? जवाब तो देना होगा!

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