गरीब आदिवासी महिला से SBI बागबाहरा की 'क्रूरता': पति की मौत को हुए 4 साल, बीमा के 2 लाख रुपए के लिए बैंक का काट रहा है चक्कर; क्या बिना 'चढ़ावे' के नहीं मिलेगी राशि ?




अनवरपुर/बागबाहरा


 कहते हैं सरकारें और बैंक गरीबों की मदद के लिए योजनाएं बनाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। भारतीय स्टेट बैंक (SBI) बागबाहरा की संवेदनहीनता का एक ऐसा ही शर्मनाक मामला महासमुंद जिले के ग्राम अनवरपुर से सामने आया है, जहाँ एक गरीब आदिवासी विधवा महिला पिछले 4 सालों से बैंक की लापरवाही और प्रताड़ना का शिकार हो रही है।


​4 साल पहले उजड़ा सुहाग, अब बैंक उजाड़ रहा है उम्मीद 


मामला ग्राम अनवरपुर निवासी कान्ति बाई दीवान (पति स्वर्गीय पूरन दीवान) का है। 4 साल पहले एक दर्दनाक सड़क हादसे में कान्ति बाई के पति पूरन दीवान का आकस्मिक निधन हो गया था। इस दुखद घड़ी में परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। मृतक पूरन दीवान का एसबीआई बागबाहरा में खाता था, जिसमें से केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना (PMSBY) के तहत हर साल बीमा राशि ऑटो-डेबिट (नियमित रूप से कटौती) की जाती थी। नियम के मुताबिक, दुर्घटना में मृत्यु होने पर पीड़ित परिवार को ₹2,00,000 (दो लाख रुपए) की सहायता राशि मिलनी चाहिए।





​प्रीमियम काटने में फुर्ती, क्लेम देने में 4 साल की 'सुस्ती'! 



पीड़िता कान्ति बाई पिछले 4 वर्षों से लगातार एसबीआई शाखा के चक्कर काट-काटकर थक चुकी है। सारे जरूरी दस्तावेज, पुलिस FIR, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और मृत्यु प्रमाण पत्र जमा करने के बाद भी बैंक कर्मचारी हर बार उसे कोई न कोई बहाना बनाकर भगा देते हैं। जब हर साल खाते से बीमा का प्रीमियम काटने में बैंक एक दिन की भी देरी नहीं करता, तो एक गरीब विधवा को उसका हक देने के समय 4 साल तक क्यों घुमाया जा रहा है?



​पूर्व सरपंच प्रतिनिधि सहजान पाशा बने लाचार मां-बेटे का सहारा 



जब इस गंभीर और अमानवीय मामले की जानकारी  अनवरपुर के पूर्व सरपंच प्रतिनिधि सहजान पाशा को हुई, तो उन्होंने इस मुद्दे को 'तीखी नज़र' न्यूज़ के सामने लाया। पाशा न सिर्फ इस बेसहारा आदिवासी महिला की यथासंभव आर्थिक व सामाजिक सहायता कर रहे हैं, बल्कि उन्होंने साफ कर दिया है कि जब तक कान्ति बाई को उनका हक नहीं मिल जाता, वे बैंक प्रबंधन के खिलाफ लड़ाई जारी रखेंगे।



​तीखी नजर का तीखा सवाल: जवाब तो देना होगा! 



क्या एसबीआई बागबाहरा के कर्मचारी पूरी तरह निकम्मे और संवेदनहीन हो चुके हैं?

​क्या सभी सरकारी कागजात जमा करने के बाद भी पीड़ित महिला को 'कुछ और' (चढ़ावे) की उम्मीद में भटकाया जा रहा है, जिसके अभाव में फाइल को दबाकर रखा गया है?


​एक गरीब आदिवासी महिला को 4 साल तक मानसिक रूप से प्रताड़ित करने वाले दोषी अधिकारियों पर उच्च प्रबंधन कब कार्रवाई करेगा?


   



​तीखी नजर न्यूज़ / सुरेन्द्र यादव

 मोब - 7987825500 

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