एक तरफ जंगलों में लावारिस फेंकी जा रही हैं जीवनरक्षक दवाइयां, तो दूसरी तरफ गरीब मरीजों की जेब काटने का चल रहा है 'कमीशन खेल' ​

 


महासमुंद / बागबाहरा / बसना:



छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में स्वास्थ्य सेवाओं की असलियत अब धीरे-धीरे प्रशासनिक फाइलों से बाहर निकलकर सड़कों और जंगलों पर बिखरने लगी है। हाल ही में जिले के अलग-अलग हिस्सों से सामने आई दो बड़ी घटनाओं ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर और गहरे सवालिया निशान लगा दिए हैं। एक तरफ जहां बागबाहरा-कोमाखान मार्ग पर जंगल के बीचों-बीच सरकारी दवाइयों का भारी जखीरा लावारिस हालत में फेंका मिला, तो वहीं दूसरी ओर बसना विकासखंड के ग्राम सागरपाली (कापूडीह) में तालाब और मंदिर के पास इस्तेमालशुदा सिरिंज, सुइयां और बायोमेडिकल कचरे का अंबार मिला है।

​इन सनसनीखेज मामलों के सामने आने के बाद जब 'तीखी नजर' की टीम ने जमीनी स्तर पर पड़ताल की और ग्रामीण अंचलों के अस्पतालों व मरीजों का हाल जाना, तो स्वास्थ्य व्यवस्था की एक बेहद डरावनी और भ्रष्ट तस्वीर सामने आई।

 सरकारी गोदामों से गायब दवाइयां, जंगलों में लावारिस ढेर


​सरकारी अस्पतालों के माध्यम से आम गरीबों और जरूरतमंदों को मुफ्त इलाज और दवाएं मुहैया कराने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि बागबाहरा क्षेत्र में मुख्य मार्ग से लगे जंगलों में मेट्रिडाजोल टैबलेट, परमेथ्रीन लोशन समेत सैकड़ों दवा पैकेट, सिरप की बोतलें और टैबलेट की स्ट्रिप्स खुले में बिखरी हुई मिलीं।

बड़ा सवाल: जानकारों और स्थानीय लोगों का कहना है कि यह किसी एक व्यक्ति का कचरा नहीं, बल्कि किसी स्वास्थ्य केंद्र का भारी-भरकम स्टॉक प्रतीत होता है। यदि ये दवाइयां एक्सपायरी थीं, तो बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट के नियमों को ताक पर रखकर इन्हें खुले में फेंकना पर्यावरण और इंसानी सेहत दोनों के लिए एक बड़ा खतरा है।


​बसना क्षेत्र में तालाब किनारे मेडिकल कचरा, मंडरा रहा संक्रमण का खतरा


​दूसरी तरफ, बसना के कापूडीह में एक छोटे तालाब और मंदिर के पास इस्तेमाल की गई सुइयां, दवा की खाली शीशियां और मेडिकल अपशिष्ट खुले में फेंके मिले हैं। ग्रामीणों का कहना है कि इस रास्ते से रोजाना बच्चों, महिलाओं और पशुओं की आवाजाही होती है। बारिश के दिनों में यह कचरा पानी के साथ मिलकर जल स्रोतों को दूषित कर सकता है, जिससे इलाके में भयंकर संक्रामक बीमारियां फैलने का खतरा पैदा हो गया है।

तीखी नजर' की  पड़ताल: अस्पताल के पर्चे से लेकर प्राइवेट मेडिकल तक का 'कमीशन रैकेट'


​जब हमारी टीम ने इन मामलों की तह तक जाने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों और स्वास्थ्य केंद्रों के भीतर का जायजा लिया, तो एक नया और चौंकाने वाला सच सामने आया:

बाहर की महंगी दवाएं लिखने का दबाव: ग्रामीण इलाकों के गरीबों को सरकारी अस्पतालों में आसानी से दवाइयां नहीं मिलतीं। मजबूरन उन्हें अपनी गाढ़ी कमाई खर्च कर प्राइवेट मेडिकल स्टोरों से ऊंचे दामों पर दवाएं खरीदनी पड़ती हैं।

डॉक्टरों और मेडिकल संचालकों की सेटिंग: पड़ताल में यह बात सामने आई कि सरकारी अस्पतालों के कई पर्चों पर जानबूझकर बाहर की दवाइयां लिखी जाती हैं, जिसके पीछे डॉक्टरों और प्राइवेट मेडिकल संचालकों का अंदरखाने कमीशन का खेल काम करता है।

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) का हाल और भी बदतर


गाँवों के स्वास्थ्य केंद्रों में तैनात कुछ जिम्मेदार कर्मियों (जैसे आरएचओ, एसएचओ और स्टाफ नर्सों) पर यह आरोप आम है कि वे गर्भवती महिलाओं और सामान्य मरीजों को किसी बड़ी अनहोनी या खतरे का झूठा डर दिखाते हैं। डर के मारे ग्रामीण सरकारी अस्पताल छोड़कर तुरंत प्राइवेट अस्पतालों या नर्सिंग होम की तरफ भागते हैं, और बदले में इन बिचौलियों को मोटा कमीशन मिलता है।


​तीखी नजर का सवाल


​विधानसभा सत्र के दौरान जब स्वास्थ्य सेवाओं और दवा खरीद की पारदर्शिता पर सवाल गूंज रहे थे, ठीक उसी समय महासमुंद जिले के भीतर इस तरह की लापरवाही यह बताती है कि मैदानी अमले पर से उच्च अधिकारियों का नियंत्रण पूरी तरह खत्म हो चुका है।

​क्या जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारी इस अमानवीय और लापरवाह व्यवस्था पर कोई सख्त एक्शन लेंगे? या फिर इसी तरह गरीबों की सेहत से खिलवाड़ और कमीशनखोरी का खेल बेखौफ चलता रहेगा


Post a Comment

Previous Post Next Post
💬 WhatsApp