तीखी नज़र: 45 डिग्री का टॉर्चर और 8 हजार की सैलरी! महासमुंद नगर पालिका की 'संवेदनहीनता' का कड़क पर्दाफाश!


    




​        महासमुंद : 


आसमान से आग बरस रही है... पारा 45 डिग्री को चूम रहा है... और लू के थपेड़े जिस्म को झुलसा रहे हैं। ऐसे में एक सरकारी फरमान आता है—"मवेशियों (पशुओं) से इस धूप में काम न लिया जाए, उन पर तरस खाया जाए!" वाह! क्या मानवीय संवेदना है। तालियां बजनी चाहिए।


​लेकिन रुकिए... असली सस्पेंस तो अब शुरू होता है!


​इसी महासमुंद की तपती सड़कों पर, दोपहर की उस कांपती धूप में दूर से एक साया आता हुआ दिखता है। वो हांफ रहा है, उसका पसीना सड़क पर उबल रहा है। पास जाकर 'तीखी नज़र' ने देखा, तो कलेजा कांप गया। वो कोई जानवर नहीं, बल्कि इस शहर को साफ रखने वाली हमारी 'सफाई मित्र बहनें' थीं!

​अब बड़ा सवाल यह है कि क्या सिस्टम की नज़र में इंसानों की जान की कीमत मवेशियों से भी कम हो गई है?


10 घंटे काम . और पसीने की कीमत सिर्फ 8 हजार?


​ज़रा इस दर्दनाक गणित को समझिए। नगर पालिका की करीब 117 सफाई मित्र बहनें हफ्ते में 6 दिन, रोज़ाना 10 घंटे मौत से जूझती हैं।


​सुबह 6:30 बजे 'निष्ठा ऐप' पर अंगूठा लगाते ही इनकी अग्निपरीक्षा शुरू हो जाती है।

​30 वार्डों की उबड़-खाबड़ सड़कों पर भारी-भरकम रिक्शा खींचना।

​शहर से 2 किलोमीटर दूर खरोरा, खैरा और दलदली रोड के मणिकंचन केंद्रों तक कचरा पहुंचाना।



​चक्कर आ जाए, ब्लड प्रेशर बढ़ जाए या बदन बुखार से तप रहा हो... काम रुकना नहीं चाहिए। इन बहनों की सिर्फ एक जायज मांग है—"साहब, इस कातिल गर्मी में ड्यूटी का वक्त सुबह 7 से शाम 4 बजे के बजाय, सुबह 6 से दोपहर 12 बजे तक कर दो।" लेकिन बहरे सिस्टम के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही!


​विचित्र विडंबना: कंगाली में आटा गीला, रिक्शा खराब तो जेब ढीली!


​सस्पेंस का सबसे कड़क और कड़वा मोड़ तो अब आता है। इन बहनों को वेतन मिलता है महज 8,000 रुपये महीना। लेकिन ज़ुल्म की इंतहा देखिए! नगर पालिका ने जो टूटे-फूटे फुट-रिक्शा थमाए हैं, उनकी मरम्मत का खर्च भी इन गरीब बहनों की जेब से वसूला जाता है।


​"अगर रिक्शा खराब हुआ, तो 1 से 2 हजार रुपये अपनी जेब से दो!"


यानी शहर साफ करने का इनाम यह है कि आधी तनख्वाह रिक्शे की वेल्डिंग और कबाड़ ठीक कराने में फूंक दो! क्या यही है आपका 'मिशन क्लीन सिटी'?


​तीखी नज़र का तीखा सवाल: संवेदनाओं पर सिर्फ पशुओं का हक?


​'तीखी नज़र' आज महासमुंद के हुक्मरानों से सीधा और कड़क सवाल पूछती है:


​जब मवेशियों के लिए धूप का कानून बदल सकता है, तो इन बहनों के लिए क्यों नहीं?


क्या 8 हजार की नौकरी करने वालों का खून, खून नहीं पानी है?


​एसी कमरों में बैठकर 'स्वच्छता का मेडल' डकारने वाले अफसरों को इन बहनों की सिसकियां क्यों नहीं सुनाई देतीं?


अब देखना है कब जागेगा महासमुंद का प्रशासन?


​इस खौफनाक गर्मी के बीच जब यह दर्दनाक सच्चाई सामने आई है, तो अब गेंद महासमुंद जिला प्रशासन और नगर पालिका के पाले में है। सूत्रों के मुताबिक, मामला आला अधिकारियों के संज्ञान में आ चुका है और जल्द ही समय बदलने का आश्वासन मिला है। लेकिन 'तीखी नज़र' पूछती है कि इस आश्वासन की ठंडी हवा इन बहनों तक कब पहुंचेगी?





ब्यूरो रिपोर्ट, 'तीखी नज़र' न्यूज़।






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