विशेष डेस्क, तीखी नज़र न्यूज़:
गर्मी ऐसी पड़ रही है कि सूरज देवता सीधे खोपड़ी पर आकर बैठ गए हैं। गला सबका सूख रहा है। अब आप सोच रहे होंगे कि 'तीखी नज़र' आज छत्तीसगढ़ के 'बोरे-बासी' और तीखुर के शर्बत को छोड़कर पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश के इंदौर की बात क्यों कर रहा है?
रुको-रुको, खबर में ऐसा सस्पेंस और तगड़ा सबक है कि अगर आज इसे नहीं पढ़ा, तो कल को अपने यहां भी यही 'खेल' हो सकता है। क्योंकि सियासतदानों की नसें हर जगह एक जैसी ही होती हैं!
गायब पानी अचानक कहां से प्रकट हो गया?
मामला देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर का है। वहां एक इलाका है पालदा। पिछले कई दिनों से वहां के लोग पानी की बूंद-बूंद को तरस रहे थे। नल सूखे, बोरवेल ठन-ठन गोपाल और नगर निगम के टैंकर मानो ईद का चांद हो गए।
जनता परेशान, तो वहां के एक पार्षद महोदय कुणाल सोलंकी पब्लिक को लेकर सड़क पर बैठ गए। चक्काजाम हो गया।
पार्षद जी पानी के लिए पुलिस वालों के पैरों में गिरकर गिड़गिड़ाने लगे
"माई-बाप, राजनीति छोड़ो, जनता प्यासी है, चार टैंकर पानी भिजवा दो।"
अधिकारी बोले "अरे नेता जी, पानी की भारी किल्लत है, सूखा पड़ा है, टैंकर कहां से लाएं?
तभी हुआ वो चमत्कार... जो आपको हैरान कर देगा!
पीने का नहीं है, तो 'डराने' का पानी लाओ!
निगम के पास जनता का गला तर करने के लिए चार टैंकर पानी नहीं था। लेकिन जैसे ही चक्काजाम की खबर ऊपर बैठी सरकार (मोहन यादव सरकार) तक पहुंची, वैसे ही प्रशासन ने 'अलादीन का चिराग' घिसा।
पलक झपकते ही वहां पुलिस की 'वॉटर कैनन' (पानी की बौछार मारने वाली गाड़ियां) आकर खड़ी हो गईं, वो भी पानी से लबालब भरी हुई!
सोचिए जरा... क्या गजब का सिस्टम है
जनता कह रही है— प्यासे मर रहे हैं, पीने का पानी दो।
सरकार कह रही है— पीने का तो नहीं है, लेकिन अगर ज्यादा चिल्लाए, तो इसी वॉटर कैनन से भिगो-भिगो कर मारेंगे! पानी की कमी थोड़ी न है हमारे पास!
विपक्ष चिल्लाता रह गया कि भैया, जो पानी आंदोलनकारियों को भगाने के लिए लाए हो, वही दो-चार बाल्टी जनता के बर्तनों में डाल देते, तो आंदोलन खुद-ब-खुद खत्म हो जाता। पर साहब, लॉ एंड ऑर्डर (कानून-व्यवस्था) के आगे जनता की प्यास की क्या औकात!
🌾 छत्तीसगढ़ के भाई-बहनों के लिए 'तीखी नज़र' की बड़ी सीख!
अब हमारे छत्तीसगढ़ के सियान और संगी-साथी सोच रहे होंगे कि
"अरे भाई, ये तो मध्य प्रदेश का मामला है, हम काहे माथा पच्ची करें ?
तो सुनो संगवारी हो! चाहे इंदौर हो, रायपुर हो, बिलासपुर हो या दुर्ग-भिलाई या हो महासमुंद बागबाहरा ... गर्मी हर जगह बराबर पड़ रही है और जलस्तर सब जगह नीचे जा रहा है। इस खबर से हमारे छत्तीसगढ़ के पाठकों के लिए तीन बड़े सबक (सीख) छिपे हैं:
नेताओं के भरोसे मत बैठो:
चुनाव खत्म होते ही पानी 'अमृत' से सीधे 'गायब' हो जाता है। चाहे सरकार किसी की भी हो, पानी बचाने का इंतजाम खुद करना पड़ेगा (वॉटर हार्वेस्टिंग याद है न?
सिस्टम का गजब गणित:
ये सरकारी सिस्टम बड़ा शातिर है। इसके पास जनता की बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए बजट और संसाधन हमेशा कम पड़ जाते हैं, लेकिन जब जनता को दबाना या डराना हो, तो इंतजाम मिनटों में 'फुल' हो जाता है।
अगली बार जब वोट मांगने आएं:
तो उनसे सड़क-बिजली के साथ-साथ यह लिखित में ले लेना गर्मी में पीने का पानी दोगे या धरना देने पर वॉटर कैनन का?"
📌 चलते-चलते:
खैर, तीखे ड्रामे के बाद इंदौर प्रशासन ने घुटने टेके और टैंकर भेजने का आश्वासन दिया, तब जाकर मामला शांत हुआ। पर देश की जनता को एक नया 'बिजनेस मॉडल' समझ आ गया है
अगर घर में पानी खत्म हो जाए, तो बाल्टी-तसला लेकर सीधे चौक पर धरना दे दो... पीने को न सही, वॉटर कैनन के बहाने नहाने को तो पानी मिल ही जाएगा!
ब्यूरो रिपोर्ट, तीखी नज़र न्यूज़।


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