बागबाहरा / (महासमुंद)
सरकारी विज्ञापनों में चमचमाता 'सुशासन' जब धरातल की खुरदरी हकीकत से टकराता है, तो जनता का आक्रोश 'लेटर बम' बनकर फूटता है। बागबाहरा में आयोजित 'सुशासन तिहार 2026' के समाधान शिविर में आज कुछ ऐसा ही तीखा नजारा देखने को मिला। पंडाल ऐसा सजे था मानो प्रशासन सीधे जनता के दुखों का परमानेंट इलाज करने उतरा हो, लेकिन तभी एक सीधे-साधे ग्रामीण ने सीधे मुख्यमंत्री के नाम ऐसा आवेदन पटका कि सुशासन का गुब्बारा पल भर में फुस्स हो गया।
सुशासन का सस्पेंस: एक साल में चार फाइलें डकार गया सिस्टम!
शिविर में वीआईपी ट्रीटमेंट के बीच असली धमाका तब हुआ जब बांदुमुड़ा (कलमीदादर) के ग्रामीण माखन सिन्हा ने अपनी अर्जी टेबल पर रख दी। अफसरों को लगा कि कोई आम फरियादी है, आश्वासन की मीठी गोली देंगे और रफा-दफा कर देंगे। लेकिन माखन भैया आज सिस्टम का पूरा कच्चा चिट्ठा खोलकर आए थे। उन्होंने अपने आवेदन में जो लिखा, उसने बड़े-बड़े साहबों के चेहरे का रंग उड़ा दिया।
ग्रामीण ने साफ अक्षरों में लिखा....
"माननीय मुख्यमंत्री महोदय जी, पिछले साल 4 आवेदन इसी सुशासन त्योहार में दिया था, जिसमें आज तक किसी भी समस्या का निराकरण नहीं हुआ। इसलिए ये सुशासन त्योहार को बंद किया जाये, ये सिर्फ शासन की वाहवाही लूटने का काम है।"
सोचिए, पिछले साल जनता ने जिन उम्मीदों के साथ चार अर्जियां अफसरों को सौंपी थीं, सिस्टम उन्हें ऐसे डकार गया कि साल भर बाद भी उनका अता-पता नहीं है। जनता साल भर तक दफ्तरों के चक्कर काटती रही और साहब लोग फाइलों को आगे सरकार बस 'अगली तारीख' का खोखला आश्वासन देते रहे।
वाहवाही का तिहार या जनता का शिकार?
माखन सिन्हा के इस एक तीखे प्रहार ने साबित कर दिया कि ग्राउंड जीरो पर अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। यह लड़ाई अब किसी एक छोटे-मोटे काम की नहीं, बल्कि 'जनता बनाम सुस्त सरकार और सिस्टम' के बीच की आर-पार की जंग बन चुकी है। सुशासन तिहार का असली मतलब अगर सिर्फ सरकारी खर्च पर टेंट तानना, अफसरों की 'हाजिरी' लगवाना और फोटो खिंचवाकर अखबारों में पीठ थपथपाना है, तो जनता भी अब दूध की जली है। अफसरों को लग रहा था कि जनता आंखें मूंदकर सब सह लेगी, पर यहाँ तो पीड़ित ने सीधे व्यवस्था की नाक पर चोट कर दी।
तीखी नज़र का निष्पक्ष विश्लेषण
तीखी नजर के चश्मे से देखें तो यह वाकया साफ करता है कि नीचे बैठा प्रशासनिक अमला एसी कमरों में बैठकर सरकार की साख को बट्टा लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। जब एक आम नागरिक को सरेआम यह लिखना पड़े कि "यह सिर्फ वाहवाही लूटने का काम है", तो समझ जाइए कि योजनाएं सिर्फ कागजों पर ही दम तोड़ चुकी हैं। सुशासन का ढोल बजाने वाले नेता और अफसर शायद यह भूल गए हैं कि जनता अब सब समझती है।
हमारा विचार:
बागबाहरा का यह 'लेटर बम' इस बात का गवाह है कि जनता अब कागजी घुट्टियों से बहलने वाली नहीं है। अब देखना यह है कि इस तीखे प्रहार के बाद रायपुर से लेकर महासमुंद तक बैठे आला अधिकारी अपनी कुंभकर्णी नींद से जागते हैं या फिर 'रात गई, बात गई' वाले पुराने ढर्रे पर ही सुशासन का तमाशा चलता रहेगा। साहब, जनता की नजर अब एक्सरे मशीन से भी ज्यादा तीखी हो चुकी है, बच कर कहां जाओगे!


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