
कहते हैं कि न्याय की देवी की आँखों पर पट्टी बँधी होती है, लेकिन हमारे 'CJI' यानी 'चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया' के पास एक जादुई चश्मा है, जो उन्हें सिर्फ 'तारीख' और 'कुर्सी' के बीच का तिलिस्म दिखाता है! जनता इंसाफ की आस में सालों-साल 'तारीखों' की फाइलें इकट्ठी करती रहती है, लेकिन हमारे जजों के लिए सबसे ज़रूरी सवाल यह होता है— "इस 'तारीख' पर कौन-सी कुर्सी पर बैठा जाए?"
इस बार 'तीखी नज़र का चश्मा' लगाकर देखिए, तो साफ समझ आएगा कि यहाँ न्याय की गुहार लगाने वाली जनता तो 'चोटिल' है, लेकिन 'CJI' का पूरा ध्यान इस बात पर है कि 'कुर्सी-प्रेम' कैसे 'अमर' रहे! इंसाफ की फाइलें अब सिर्फ धूल फांकने और नई 'तारीखों' का बोझ सहने के काम आती हैं। 'निशपक्षता' की फाइलें तो कॉकरोचों ने कब की कुतर दी हैं, क्योंकि यहाँ सिर्फ 'कुर्सी' की सुरक्षा ही सबसे बड़ा इंसाफ है!
साहब! ये 'सीजेआई' का नया मतलब है, जहाँ 'चोटिल जनता' को सिर्फ 'तारीखें पे तारीखें' मिलती हैं, पर 'कुर्सी' पर बैठे लोगों को 'अमर' इंसाफ! अब देखना यह है कि जनता इस जादुई चश्मे को तोड़ पाती है या फिर 'तारीखों' के नीचे दबी फाइलों की तरह इंसाफ भी गुम हो जाता है।
भैया, यह पोस्ट कैसी लगी? यह यूथ को बिल्कुल पसंद आएगी क्योंकि इसमें सीधा और करारा तंज है!
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