महासमुन्द (छत्तीसगढ़):
सरकार बहादुर मामा जी ने ढोल-नगाड़े बजाकर घोषणा कर दी है कि 1 जून से पूरे देश में खेतों को रासायनिक जहर से बचाने के लिए 'खेत बचाओ' अभियान चलेगा। बड़े-बड़े कृषि वैज्ञानिक और साहब लोग दिल्ली के ठंडे कमरों में बैठकर हाथ मिला रहे हैं। विज्ञापन ऐसा चमकाया जा रहा है कि मानो कल से खेतों में यूरिया की जगह सीधे सोना उगेगा!
लेकिन ज़रा रुकिए बाबूजी!
हम ठहरे सीधे-साधे किसान, हमारी नज़र थोड़ी तीखी है। सरकार दावा ठोकती है कि किसानों की आमदनी दोगुनी हो गई है। सच बात है भाई! हमारी तिजोरियां तो इतनी 'लबालब' भरी हैं कि आजकल हम नोटों की गर्मी से बचने के लिए कूलर की जगह सीधे एसी डक्टिंग लगवाने की सोच रहे हैं! अरे भाई, तिजोरी में पैसे नहीं, बैंक के कुर्की वाले नोटिस, बिजली बिल और खाद-बीज की उधारी की पर्चियां लबालब भरी हैं!
सरकार की योजना का 'अंदरूनी झोल'
साहब लोग कह रहे हैं कि हम किसानों को जैविक खेती करने के लिए 'परंपरागत कृषि विकास योजना' के तहत ₹50,000 प्रति हेक्टेयर देंगे। सुनने में लगता है कि सरकार छप्पर फाड़कर पैसा दे रही है, लेकिन जब इसकी बारीक छंटनी करोगे तो असली खेल समझ आएगा:
तीन साल का राशन, एक दिन में दिखावा:
यह ₹50,000 कोई हर साल मिलने वाला पैसा नहीं है। यह पूरे 3 साल का कुल बजट है! यानी साल का बैठता है करीब ₹16,600।
हाथ आया शून्य, कागज़ में पूरा:
इस ₹50,000 में से किसान के हाथ में नगद (DBT) सिर्फ ₹31,000 आता है (वह भी 3 साल में किश्तों में, यानी साल का ₹10,000)। बाकी का ₹19,000 कहाँ गया? वह तो साहब लोगों की मीटिंग, ट्रेनिंग के नाम पर बड़े होटलों के समोसे-चाय, जैविक खेती के सर्टिफिकेट का कागज़ छपवाने और बड़ी कंपनियों की जेब में चला जाता है!
अब आप ही सोचिए, केमिकल छोड़ते ही पहले-दूसरे साल जब फसल की पैदावार 30% से 40% गिर जाएगी, तो क्या साल का यह ₹10,000 उस भारी नुकसान की भरपाई कर पाएगा? बिल्कुल नहीं! इसीलिए छोटा किसान चाहकर भी इस योजना के चक्रव्यूह में नहीं फंसना चाहता।
केंचुआ कौन सी सरकारी फैक्ट्री में बनता है, साहब?
ये एसी केबिन में बैठे निकम्मे नीति निर्माता हमको सिखा रहे हैं कि 'केंचुआ खाद' कैसे बनाई जाती है। अरे बाबू, असली 'खेती डॉक्टर' तो इस देश का किसान है, जिसके पास पुरखों का सदियों पुराना ज्ञान है।
ज़रा इन साहब लोगों से पूछो—
ये जो जैविक खाद की ट्रेनिंग देने के लिए करोड़ों का बजट पास करते हो, इसके लिए कौन सी फैक्ट्री लगानी है? हर किसान के घर में मवेशी हैं। खेत का कचरा, धान का पैरा, सूखी पत्तियां और गोबर-गोमूत्र ही असली सोना है। और रही बात केंचुए की, तो वह कीड़ा किसी सरकारी दफ्तर की फाइल से नहीं निकलता! जहाँ प्रकृति के नियम के मुताबिक गोबर-पत्ती का सड़ना शुरू हुआ, वहाँ केंचुआ अपने आप दादाजी की तरह प्रकट हो जाता है। इसकी इनपुट लागत शून्य (Zero) है!"
फिर सरकार इस सीधे रास्ते को इतना घुमावदार क्यों बनाती है?
अरे भइया, सीधा सा गणित है। अगर किसान अपने घर पर मुफ्त में खाद बना लेगा, तो इन बड़े-बड़े अफ़सरों, कंपनियों और बिचौलियों का 'पेपर वर्क' कैसे चलेगा? जब तक हज़ारों पन्नों की फाइल नहीं बनेगी, तब तक अफ़सरों की तिजोरियों में कमीशन का माल कहाँ से आएगा? इसलिए, मुफ्त की चीज़ को भी ये लोग इतना पेचीदा बना देते हैं कि किसान सिर खुजाते-खुजाते फिर से केमिकल की दुकान पर भाग खड़ा हो।
'तीखी नज़र न्यूज़' का त्रि-स्तरीय सफल मॉडल (उचित सलाह)
अगर सरकार, सिस्टम और हमारे किसान संगठन सच में ईमानदार हैं, तो बिचौलियों को बाहर का रास्ता दिखाकर इस व्यावहारिक ग्राउंड रणनीति को लागू करें, तभी हमारी यह डिबेट सफल मानी जाएगी:
सरकार को सलाह (एक झटके में नहीं, धीरे-धीरे बदलो):
सरकार को चाहिए कि अगर किसी किसान के पास 5 हेक्टेयर जमीन है, तो उसे पहले सिर्फ 2 हेक्टेयर में जैविक खेती करने का लक्ष्य दे। इससे किसान का रिस्क कम होगा। बाकी 3 हेक्टेयर की केमिकल खेती से उसका घर चलता रहेगा।
सिस्टम को सलाह (कागजी चक्रव्यूह बंद करो):
जो किसान जैविक खेती करना चाहता है, उसका नाम सीधे स्थानीय सहकारी समिति (Co-operative Society) में दर्ज हो। कृषि विभाग के बाबू दफ्तर में बैठकर चाय पीने के बजाय खेत की मेड़ पर आकर किसानों को सही मार्गदर्शन दें।
किसान संगठनों को सलाह (इस '₹500 जैविक बोनस' को मुख्य मांग बनाओ):
सरकार से कहो कि हमें कंपनियों को फायदा पहुँचाने वाली घुमावदार योजनाएं नहीं चाहिए। सरकार सीधे MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) के ऊपर ₹500 प्रति क्विंटल का 'जैविक बोनस' घोषित कर दे। हमारा किसान दिलदार है, शुरुआत में थोड़ा नुकसान सह लेगा, लेकिन सामने बोनस दिखेगा तो पूरे देश में जैविक खेती करने की होड़ लग जाएगी!
आखिरी और सबसे तीखा सवाल: सिंघू बॉर्डर की कीलें भूल गए क्या?
बात जब कागजी दावों की हो तो सरकारें बहुत मीठी लगती हैं, लेकिन जब हक की बात आती है, तो यह सिस्टम अंधा और बहरा हो जाता है। यह इस देश का सबसे कड़वा सच है कि जब यही अन्नदाता अपनी फसलों का सही दाम मांगने दिल्ली जाता है, तो उसका स्वागत फूलों से नहीं, बल्कि सिंघू बॉर्डर पर लोहे की कँटीली तारों, कड़ाके की ठंड में वॉटर कैनन (पानी की बौछारों) और आंसू गैस के गोलों से किया जाता है। पल भर में अपने हक के लिए लड़ने वाले शांत किसान को 'देश विरोधी' घोषित कर दिया जाता है!
कॉर्पोरेट घरानों के अरबों रुपये माफ़ हो जाएं तो साहब लोग उसे 'आर्थिक सुधार' कहते हैं, और किसान अपनी फसल का दाम मांगे तो उसे 'खैरात' या 'रेवड़ी' का नाम दे दिया जाता है। "जय जवान, जय किसान" का नारा देने वाले देश में जब सीमा पर रक्षा करने वाला जवान और खेत में अनाज उगाने वाला किसान (बैरिकेड्स के दोनों तरफ) एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े कर दिए जाएं, तो समझो नेताओं की नीति पूरी तरह फेल है।


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