कोमाखान :-
अंकित बागबाहरा के नेतृत्व में, सोया हुआ तंत्र अब सावधान !
क्या किसान अब खाद के लिए भीख मांगेगा? बोइरगांव में फूटा किसानों का गुस्सा!
महासमुंद के बोइरगांव में आज किसानों का धैर्य जवाब दे गया है। जब खेत को खाद चाहिए, तब सरकार उसे 'किस्तों' में देकर उसका मज़ाक उड़ा रही है। यह नीति है या किसानों को भिखारी बनाने की साज़िश?
व्यवस्था की विडंबना और अंकित बागबाहरा की ललकार:
अंकित बागबाहरा ने बोइरगांव की नई सोसायटी के पंजीयन (955) का उल्लेख करते हुए सिस्टम की पोल खोल दी। उन्होंने कहा, "सोसायटी तो स्वीकृत हो गई, लेकिन सुविधाएँ गायब हैं।" यह बयान सिस्टम की उस खोखली कार्यप्रणाली को दर्शाता है, जहाँ कागज़ पर तो सब ठीक है, पर ज़मीनी हकीकत शून्य है।
उन्होंने शासन पर हमला करते हुए कहा: "अप्रैल से खाद मिलनी चाहिए थी, पर जून आ गया। शासन का तंत्र किसान की फसल चक्र की चिंता करने के बजाय अपनी फाइलों को घुमाने में लगा है। हम खाद मांग रहे हैं, भीख नहीं! खाद की कालाबाज़ारी और किस्तों का यह खेल बंद करो, वरना इस बार घेराव सिर्फ दफ्तर का नहीं, सरकार के अहंकार का भी होगा!"
जिम्मेदारी का सवाल और भविष्य की चेतावनी:
अंकित बागबाहरा ने सीधा सवाल किया: "अगर खाद समय पर नहीं मिली और फसल कम हुई, तो इसका जिम्मेदार कौन होगा?" यह केवल एक राजनीतिक प्रश्न नहीं, बल्कि एक भविष्य की चेतावनी है, जो सीधे तौर पर शासन की जवाबदेही तय करती है।
किसान एकता का बिगुल:
अंकित ने किसानों की एकता को इस संघर्ष का आधार बताया है। उन्होंने गर्व के साथ कहा, "महा-समुंद जिले में बोइरगांव पहली ऐसी समिति होगी जिसने एकजुट होकर बिगुल फूँका है।" यह इस बात का प्रमाण है कि अब किसान सिर्फ अपनी फरियाद नहीं रखेगा, बल्कि अपना हक छीन कर लेगा।
किसान रामलाल नायक का दर्द:
व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए रामलाल नायक ने अपना पीड़ा व्यक्त की:
"हम अपनी फसल बोने के लिए खाद मांग रहे हैं सरकार ने हमें खाद के लिए कतारों में खड़ा कर दिया है और सोसायटी वाले हमें 'किस्तों' में खाद थमा रहे हैं। क्या हमारा खेत किस्तों में फसल देता है? ये व्यवस्था किसान के लिए नहीं, सिर्फ 'दस्तावेज़' और 'दफ्तरों' के लिए बनी है!"
बोइरगांव सोसायटी: खाद की स्थिति का सरल विवरण
हमारे क्षेत्र के किसानों की मेहनत और फसल की चिंता को देखते हुए, बोइरगांव सोसायटी में खाद के स्टॉक की वर्तमान स्थिति का ब्यौरा नीचे दिया गया है:
कुल स्टॉक की स्थिति:
सोसायटी में अभी कुल 80 टन खाद उपलब्ध है, जिसका विवरण इस प्रकार है:
यूरिया: 30 टन
NPK: 15 टन
SHC (सरल खाद): 25 टन
पोटाश: 10 टन
क्या यह खाद पर्याप्त है?
यहाँ कुल 500 किसान जुड़े हुए हैं। यदि इस 80 टन खाद को सभी किसानों में बांटा जाए, तो प्रति किसान औसतन मात्र 160 किलो (करीब 3 बोरी) खाद ही आ पाती है। खेती की वास्तविक जरूरतों और अलग-अलग फसलों को देखते हुए, यह मात्रा वर्तमान मांग के मुकाबले काफी कम है।
व्यवस्थापक का पक्ष:
सोसायटी व्यवस्थापक, नेहरू पांडे जी का कहना है कि वे स्वयं एक किसान होने के नाते किसानों की परेशानी को भली-भांति समझते हैं। उनका स्पष्ट कहना है कि वे किसानों को राहत पहुँचाने के लिए पूरी कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वे सरकारी नियमों और सिस्टम के दायरे में काम करने के लिए मजबूर हैं।
निष्कर्ष:
वर्तमान में केवल NPK खाद का वितरण किया जा रहा है। स्टॉक की कमी को देखते हुए, किसानों को और खाद की तत्काल आवश्यकता पड़ेगी। यदि समय रहते शासन द्वारा और खाद का आवंटन नहीं किया गया, तो आने वाले समय में खाद का संकट गहरा सकता है।
सिस्टम से 'तीखी नज़र' का तगड़ा सवाल:
क्या आपकी 'व्यवस्था' का मतलब सिर्फ किसान का अपमान है? जो खाद खेत में जाकर सोना उगल सकती थी, वह आज सोसायटियों में 'किस्तों' में क्यों लटक रही है?
कालाबाज़ारी और किस्तों का यह खेल किसके इशारे पर चल रहा है? क्या यह प्रबंधन की नाकामी है, या जानबूझकर किसान को मजबूर करने की साज़िश?
जनता से अपील:
"मेरे किसान साथियों, आज जो घेराव हो रहा है, यह सिर्फ खाद की मांग नहीं—यह हमारे स्वाभिमान की लड़ाई है। अगर आप इस अन्याय के खिलाफ हैं, तो इस पोस्ट को इतना शेयर करें कि यह आवाज़ सत्ता के गलियारों तक गूँज जाए। अब चुप रहना यानी अपनी बर्बादी को न्योता देना है! आप इस बारे में क्या सोचते हैं? अपनी राय कमेंट में बेबाकी से रखें!"
सुरेन्द्र यादव / तीखी नजर न्यूज़
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