बाग़बाहरा/महासमुंद/गरियाबंद:
आज पूरी दुनिया में 'विश्व ऊदबिलाव दिवस' (27 मई) मनाया जा रहा है। इस खास मौके पर छत्तीसगढ़ के पर्यावरण और वन्यजीव प्रेमियों के लिए एक बेहद सुखद और ऐतिहासिक खबर सामने आई है। पीसीसीएफ श्री अरुण कुमार पाण्डेय के कुशल मार्गदर्शन में प्रदेश में चल रहे शोध के दौरान गरियाबंद जिले के उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व के जल स्रोतों में दुर्लभ ऊदबिलाव (Otter) की प्रामाणिक खोज करने में वैज्ञानिकों को बड़ी सफलता मिली है।
गरियाबंद वन मंडल के डीएफओ वरुण जैन द्वारा उपलब्ध कराए गए इनपुट्स पर काम करते हुए स्वयंसेवी संस्था 'छत्तीसगढ़ विज्ञान सभा' के जीव वैज्ञानिकों ने पिछले एक साल के कड़े परिश्रम के बाद इस क्लास वन संरक्षित प्राणी के रहवास के पुख्ता सबूत जुटाए हैं। वन विभाग के सहयोग से लगाए गए कैमरा ट्रैप में ऊदबिलाव की स्पष्ट तस्वीरें कैद हुई हैं।
नदियों के स्वास्थ्य के 'जैव-सूचक' हैं ऊदबिलाव
वैज्ञानिक दृष्टि से ऊदबिलाव (ओटर) जलीय पारिस्थितिक तंत्र के शीर्ष शिकारी जीव हैं। ये केवल साफ और स्वस्थ जलीय वातावरण में ही जीवित रह सकते हैं, इसलिए इन्हें नदियों और ताजे पानी के स्वास्थ्य का 'बायो-इंडिकेटर' (जैव-सूचक) माना जाता है। इनका इतिहास करोड़ों साल पुराना है।
दुनिया और भारत में स्थिति:
दुनिया भर में ऊदबिलाव की 13 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से भारत में तीन प्रजातियां मिलती हैं: यूरेशियाई ऊदबिलाव (निकट संकटग्रस्त), स्मूद कोटेड आटर (चिकने फर वाला - IUCN की संवेदनशील श्रेणी) और स्मॉल क्लॉड आटर (एशियाई छोटे पंजे वाला - निकट संकटग्रस्त)। गौरव की बात यह है कि छत्तीसगढ़ में अब तक इन तीनों ही प्रजातियों की उपस्थिति दर्ज की जा चुकी है।
अनोखा व्यवहार: पीठ पर बैठाकर बच्चों को तैरना सिखाती है 'मां
छत्तीसगढ़ विज्ञान सभा की शोधकर्ता जीव वैज्ञानिक श्रीमती निधि सिंह के नेतृत्व में सौंपी गई रिपोर्ट के अनुसार, स्मूद कोटेड ऊदबिलाव दिन में भी सक्रिय रहते हैं, जबकि स्माल क्लॉड और यूरेशियन ऊदबिलाव निशाचर (रात में सक्रिय) होते हैं।
ये जीव नदी के किनारे पेड़ों की जड़ों के नीचे अपनी मांद बनाते हैं, जिसे 'हॉल्ट' कहा जाता है। इनका प्रजनन काल 60 से 80 दिनों का होता है और ये 2 से 4 बच्चों को जन्म देते हैं। इनका एक व्यवहार बेहद रोचक है— करीब तीन महीने की उम्र होने पर मादा ऊदबिलाव अपने बच्चों को अपनी छाती (पीठ) पर बैठाकर तैरना सिखाती है।
कानून का उच्चतम संरक्षण: अनुसूची-एक का जीव
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 2022 के तहत भारत में पाई जाने वाली ऊदबिलाव की सभी प्रजातियों को 'अनुसूची-एक' (Schedule-I) में रखा गया है। इसका मतलब यह है कि इन्हें कानूनन उच्चतम स्तर का संरक्षण प्राप्त है और इनका शिकार या अवैध व्यापार पूर्णतः प्रतिबंधित व गंभीर कानूनी अपराध है।
छत्तीसगढ़ में संरक्षण के जमीनी प्रयास और 'मछुआरों' के साथ संघर्ष
छत्तीसगढ़ में इस मुहिम की शुरुआत जून 2021 में हुई थी, जब कोरबा में एक नन्हा यूरेशियाई ऊदबिलाव (वैज्ञानिक नाम: लुतरा लुतरा) रेस्क्यू किया गया था। इसके बाद तत्कालीन मेंबर सेक्रेटरी बायोडायवर्सिटी बोर्ड श्री अरुण कुमार पांडेय (IFS) ने इसकी कमान विज्ञान सभा को सौंपी। वर्तमान में छत्तीसगढ़ जैव विविधता बोर्ड के मेंबर सेक्रेटरी श्री माथेशवरण वी (IFS) के नेतृत्व में कोरबा, काँकेर, गरियाबंद और बस्तर संभाग में कैमरा ट्रैपिंग के जरिए इनका निरंतर अध्ययन किया जा रहा है।
इस पूरे अभियान में वैज्ञानिकों और अधिकारियों जैसे सुश्री नीतू हर्मुख, डीएफओ वरुण जैन, बस्तर के पूर्व डीएफओ धम्मशील गणवीर, वर्तमान डायरेक्टर नवीन कुमार और कोरबा डीएफओ श्रीमती प्रेमलता यादव का विशेष योगदान रहा है।
बदली मछुआरों की सोच
(मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व)
चूंकि मछली ऊदबिलाव का मुख्य आहार है, इसलिए ये कभी-कभी मछुआरों का जाल काट देते थे, जिससे आर्थिक नुकसान होता था। इस वजह से मछुआरों और ओटर के बीच एक प्रतिस्पर्धा और संघर्ष की स्थिति थी। लेकिन छत्तीसगढ़ विज्ञान सभा के अध्यक्ष एवं पूर्व अपर कलेक्टर विश्वास मेश्राम के बेहतरीन कॉर्डिनेशन और कुशल मार्गदर्शन में प्रदेश के स्कूलों, कॉलेजों और ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार जन जागरूकता कार्यक्रम चलाए गए। इस समझाइश का जमीनी असर यह हुआ कि जो मछुआरे इन्हें पसंद नहीं करते थे, अब ओटर के संकट में होने पर वे खुद वन विभाग और विज्ञान सभा को रेस्क्यू के लिए फोन कर रहे हैं।
मेश्राम जी एवं विज्ञान सभा की टीम का विशेष संदेश:
विज्ञान आश्रम, कसेकेरा से जुड़े छत्तीसगढ़ विज्ञान सभा के अध्यक्ष विश्वास मेश्राम ने इस महत्वपूर्ण खोज के अवसर पर आम नागरिकों से एक भावुक और जिम्मेदार अपील की है:
कचरा मुक्त प्रकृति
हम जब भी पिकनिक मनाने जंगलों या जलीय क्षेत्रों में जाएं, तो अपना प्लास्टिक, कांच और कचरा वापस साथ लाएं। हमारी एक लापरवाही किसी बेजुबान की जान ले सकती है।
जलस्रोतों की रक्षा:
तालाबों, झीलों और नदियों में घातक कांच के टुकड़े या दूषित सामग्रियां न फेंकें।
सजगता और सूचना:
अगर जंगल में आग लगी देखें या किसी वन्यजीव को संकट में या जाल में फंसा देखें, तो तुरंत वन विभाग को सूचित करें। वन्यजीवों के संरक्षण के लिए युवाओं और बच्चों में संवेदनशीलता जगाना आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
आइए, इस मुहिम का हिस्सा बनें।


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