पुलिस की सुस्ती, चितरंजन की 'अर्थी : कोमाखान में सिस्टम के खिलाफ खड़ा हुआ पूरा गाँव; माँ बोली- "कातिल खुलेआम घूम रहे, अब इंसाफ कहाँ से लाउ






इलाज के दौरान 23 वर्षीय युवक की दर्दनाक मौत; ग्रामीणों ने घेरा थाना, कहा- "जब तक हथकड़ी नहीं, तब तक पीछे नहीं"

​कोमाखान (महासमुंद):

एक तरफ प्रशासन सुरक्षा के दावे कर रहा है, तो दूसरी तरफ महासमुंद के कोमाखान में एक माँ का कलेजा छिल गया है। बकमा गाँव के 23 वर्षीय होनहार चितरंजन पटेल की मौत ने न केवल एक परिवार को उजड़ दिया, बल्कि स्थानीय पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 15 अप्रैल को हुआ वो हमला, आज एक हत्या में तब्दील हो गया है, लेकिन इंसाफ आज भी फाइलों में धूल फाँक रहा है।

क्या पुलिस की फाइलों में 'दम' नहीं था?

परिजनों का आरोप है कि 15 अप्रैल को जब चितरंजन पर ग्राम लामीसरार के पास जानलेवा हमला हुआ, तो पुलिस ने इसे बहुत हल्के में लिया। लाठी, डंडे और लोहे की रॉड से कमर की हड्डी तोड़ने और सिर फोड़ने वालों को पुलिस ने शायद कोई 'छोटा मामला' समझा। परिवार तीन बार न्याय के लिए थाने की चौखट तक गया, लेकिन हर बार उन्हें सिर्फ कोरे आश्वासन मिले। नतीजे में,

अस्पताल में एक महीने से ज़्यादा समय तक ज़िंदगी और मौत के बीच कड़े संघर्ष के बाद आज चितरंजन ने दम तोड़ दिया।

"आरोपियों के नाम लिए, पर पुलिस ने हाथ पर हाथ धरे रखे"

हमले के बाद चितरंजन लगभग 7-8 दिनों तक पूरी तरह से बेहोश था। जब उसे थोड़ा होश आया, तब उसने खुद अपने हमलावरों (दीपेश साहू, कुंजन साहू, मनबाय और अन्य) के नाम पुलिस को बताए थे। बावजूद इसके, आज इतने दिन बीत जाने के बाद भी मुख्य आरोपी खुलेआम घूम रहे हैं। आखिर पुलिस को किसका इंतजार है? क्या प्रशासन किसी बड़ी घटना के होने का इंतज़ार कर रहा था?

थाने के बाहर न्याय की चीख

चितरंजन की मौत के बाद आज कोमाखान थाना परिसर में सन्नाटा नहीं, बल्कि आक्रोश का सैलाब उमड़ा। माँ लीलाबाई पटेल की बिलखती आवाज़ और ग्रामीणों की भीड़ ने यह साफ कर दिया है कि अब कोई बहाना नहीं चलेगा। ग्रामीणों ने स्पष्ट माँग की है:

  1. ​मामले में तुरंत हत्या की धारा जोड़ी जाए।
  2. ​सभी नामजद आरोपियों को तुरंत सलाखों के पीछे डाला जाए।
  3. ​लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर भी कार्यवाही हो।

'तीखी नज़र' की चेतावनी:

क्या कोमाखान पुलिस अब भी 'औपचारिकता' निभाएगी? या फिर इस बेबस माँ की आँखों के आंसू का हिसाब लेगी? यह सिर्फ एक मौत नहीं, बल्कि सिस्टम की उस विफलता का आईना है जो रसूखदारों के आगे झुक जाती है। हम इस मामले पर पैनी नजर रखे हुए हैं। न्याय मिलने तक, यह लड़ाई जारी रहेगी।


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