खल्लारी/महासमुंद।
सरकारी अस्पतालों में 'इमरजेंसी ' का मतलब भी घड़ी देखकर इलाज करना है?
एक तरफ जहाँ मानवता की मिसाल पेश करते हुए खल्लारी के सोरम सिंधी के पोस्टमास्टर वासुदेव सोनी ने दो बेजुबान बछड़ों को बचाने की कोशिश की, वहीं दूसरी तरफ शासकीय अस्पताल की 'संवेदनहीनता' ने मानवता को शर्मसार कर दिया। बछड़ों को बचाने के प्रयास में गंभीर रूप से घायल हुए पोस्टमास्टर को जब अस्पताल लाया गया, तो इलाज के बजाय उन्हें 'समय का नियम' सुनाकर घंटों इंतज़ार करवाया गया।
क्या हुआ था सुबह?
सूत्रों और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, दुर्घटना के बाद सुबह लगभग 9:40 बजे स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता सोमनाथ टोंडेकर एवं तुलेश चंद्राकर ने पूरी तत्परता दिखाते हुए घायल पोस्टमास्टर को खल्लारी शासकीय अस्पताल पहुँचाया। उन्हें उम्मीद थी कि आपातकालीन स्थिति को देखते हुए घायल को तुरंत प्राथमिक उपचार मिलेगा।
अस्पताल कर्मियों का 'अमानवीय' रवैया
आरोप है कि अस्पताल में तैनात कर्मचारियों ने यह कहकर इलाज शुरू करने से मना कर दिया कि अभी 10 नहीं बजे हैं। एक घायल व्यक्ति, जो दर्द से तड़प रहा था, उसे उपचार देने के बजाय नियमों का हवाला देकर 'वेटिंग' में रखा गया। क्या किसी आपातकालीन स्थिति में भी डॉक्टरों और स्टाफ के लिए 'घड़ी' मरीज की जान से ज्यादा महत्वपूर्ण है?
तीखी नज़र के सवाल:
क्या स्वास्थ्य विभाग के पास ऐसी स्थिति के लिए कोई 'इमरजेंसी प्रोटोकॉल' नहीं है?
10 बजे का बहाना बनाने वाले उन कर्मचारियों पर कार्रवाई कब होगी?
क्या अब अस्पताल में इलाज के लिए किसी की जान जाने का इंतज़ार किया जाएगा?
प्रशासन से मांग
स्थानीय नागरिकों और समाजसेवी कार्यकर्ताओं में इस घटना को लेकर गहरा आक्रोश है। 'तीखी नज़र न्यूज़' प्रशासन से मांग करती है कि इस मामले की तुरंत जांच की जाए और ऐसे लापरवाह कर्मचारियों पर उचित कार्रवाई हो, ताकि भविष्य में कोई दूसरा व्यक्ति सरकारी लापरवाही का शिकार न बने।
हमारा सीधा सवाल खल्लारी स्वास्थ्य विभाग से है
"यदि अस्पताल में समय देखकर इलाज होता है, तो इसे 'स्वास्थ्य केंद्र' कहना बंद कर देना चाहिए!"
इलाज के लिए खल्लारी अस्पताल, युवक का मौके पर ली गई तस्वीर


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