महासमुंद:
किसान खेतों में पसीना बहाने के बजाय सरकारी समितियों के चक्कर काटने को मजबूर हैं, और उधर राजधानी में बैठकर दावों की 'कागजी फसल' उगाई जा रही है! प्रदेश में खाद संकट को लेकर खल्लारी विधायक द्वारिकाधीश यादव ने सहकारिता मंत्री के दावों की धज्जियां उड़ाते हुए सीधे जमीनी हकीकत बताने की चुनौती दे दी है। कांग्रेस ने साफ कह दिया है कि मंत्री जी के दावों और किसानों के आंसुओं में जमीन-आसमान का फर्क है।
दम है तो एक किसान का नाम बताओ!" – विधायक की खुली चुनौती
विधायक द्वारिकाधीश यादव ने सहकारिता मंत्री को आड़े हाथों लेते हुए एक ऐसी चुनौती दी है जिससे प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है:
खुली चुनौती:
विधायक ने कहा कि अगर सरकार के दावे सच हैं और किसानों को बिना परेशानी के पर्याप्त खाद मिल रही है, तो सरकार कम से कम ऐसे एक किसान का नाम सार्वजनिक करे जिसे मांग के अनुसार बिना भटके खाद मिल गई हो!
चक्कर काटने को मजबूर:
धरातल पर स्थिति यह है कि किसान यूरिया और डीएपी (DAP) के लिए समितियों के चक्कर काट-काटकर थक चुके हैं, लेकिन उन्हें सिर्फ आश्वासन मिल रहा है।
खरीफ सीजन पर संकट: आंकड़े असली या खेल नकली?
कांग्रेस जिलाध्यक्ष और खल्लारी विधायक ने संयुक्त रूप से भाजपा सरकार की नीतियों पर कड़े सवाल दागे हैं:
दिखावे की किसान हितैषी: आरोप है कि सरकार बातें तो बड़ी-बड़ी करती है, लेकिन ऐन खरीफ सीजन के वक्त किसान खाद, बीज और सिंचाई जैसी बुनियादी चीजों के लिए तरस रहा है।
कालाबाजारी का डर: नेताओं ने मांग की है कि कागजी आंकड़े पेश करने के बजाय सरकार सभी समितियों में मौजूद वास्तविक स्टॉक की समीक्षा करे और कृत्रिम कमी पैदा करने वाले कालाबाजारियों पर तुरंत सख्त कार्रवाई करे।
सहायता राशि के नाम पर सिर्फ ऊंट के मुंह में जीरा!
खाद के साथ-साथ किसानों को मिलने वाली आर्थिक मदद पर भी तीखा प्रहार किया गया है:
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि एक हेक्टेयर के लिए निर्धारित सहायता राशि में खाद, बीज और बीमा सब कुछ जबरन शामिल कर दिया गया है, जो कि बेहद कम है।
सरकार से मांग की गई है कि इस महंगाई के दौर में सहायता राशि में तुरंत बढ़ोतरी की जाए ताकि किसानों को सही मायने में राहत मिल सके।

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