महासमुंद। छत्तीसगढ़ :
महासमुंद जिले की भौगोलिक सीमाएं पड़ोसी राज्य ओडिशा से लगती हैं। आज यह सीमा सिर्फ दो राज्यों को अलग नहीं कर रही, बल्कि किसानों की दो अलग-अलग तकदीरों को भी बयां कर रही है। कमाल का विरोधाभास है—ओडिशा में भी भाजपा की सरकार है और छत्तीसगढ़ में भी डबल इंजन की भाजपा सरकार है। लेकिन नीतियों का फर्क ऐसा है कि देखकर महासमुंद का किसान खून के आंसू रोने को मजबूर है।
एक तरफ जहां सरहद पार ओडिशा सरकार सोसायटियों के माध्यम से रबी धान की एक-एक बोरी न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर मुस्तैदी से खरीद रही है, वहीं दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ के महासमुंद में अन्नदाता को बिचौलियों के चक्रव्यूह में तड़पने के लिए लावारिस छोड़ दिया गया है।
ढोल-नगाड़ों की गूंज में दबी चीखें: यह कैसा सुशासन?
वर्तमान में पूरी छत्तीसगढ़ सरकार 'सुशासन तिहार' मनाने में मसरूफ है। राजधानी से लेकर जिलों तक ढोल-नगाड़े बज रहे हैं, योजनाओं की वाहवाही के कसीदे पढ़े जा रहे हैं। लेकिन महासमुंद जिले के ग्रामीण अंचलों में इस सुशासन की हवा निकल चुकी है।
सवाल सीधा और तीखा है— जिसे सरकार 'सुशासन' कह रही है, क्या उसकी असली परिभाषा किसानों की मजबूरी का तमाशा देखना है? जब पड़ोसी राज्य में रबी धान की सरकारी खरीदी मुमकिन है, तो छत्तीसगढ़ में मंडियों पर ताले जड़कर सुशासन का ढोंग क्यों रचा जा रहा है?
ओडिशा मॉडल बनाम महासमुंद का 'बिचौलिया राज'
महासमुंद जिले के सीमावर्ती इलाकों के किसान यह देखकर हैरान हैं कि कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर ओडिशा के किसानों को उनकी रबी फसल का पूरा और सही दाम मिल रहा है। जबकि महासमुंद के भीतर:
सोसायटियां मौन, कोचिए सक्रिय: सरकारी तंत्र की जानबूझकर ओढ़ी गई खामोशी के कारण बिचौलिए खुलेआम घूम रहे हैं।
मुहाने पर किसान:
खाद की किल्लत और मौसम की मार झेलकर फसल तैयार करने वाला किसान आज आर्थिक तबाही के मुहाने पर खड़ा है। धान को पानी के भाव बेचने की मजबूरी इस तथाकथित सुशासन के मुंह पर सबसे बड़ा तमाचा है।
कथनी और करनी का अंतर
यह स्थिति साफ करती है कि प्रशासन की रुचि सिर्फ आंकड़ों की बाजीगरी और उत्सव मनाने में है, किसानों की ज़मीनी समस्याओं को हल करने में नहीं। जब तक पड़ोसी राज्य की तर्ज पर महासमुंद में भी रबी धान खरीदी की ठोस व्यवस्था नहीं बनती या बिचौलियों पर सख्त कानूनी डंडा नहीं चलता, तब तक 'सुशासन तिहार' की यह गूंज खोखली और किसानों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसी ही महसूस होगी।
अब महासमुंद का अन्नदाता इस डबल इंजन व्यवस्था से जवाब मांग रहा है— "हुजूर, उत्सव बंद कीजिए और मंडियों के ताले खोलिए!"
यह सिर्फ आंकड़ों या शब्दों की बाजीगरी नहीं है, बल्कि एक किसान के बेटे की आँखों देखी वो कड़वी सच्चाई है जो इस वक्त महासमुंद का हर किसान झेल रहा है। जब रात-दिन एक करके, पसीना बहाकर उपजाई गई रबी की फसल को औने-पौने दाम पर बिचौलियों के हवाले करना पड़ता है, तो दिल पर क्या बीतती है, यह सिर्फ एक किसान ही समझ सकता है। यह रिपोर्ट किसी बंद कमरे में बैठकर नहीं लिखी गई, यह महासमुंद के खेतों के मुहाने पर खड़े होकर, अपने किसान भाइयों की आँखों की बेबसी को देखकर लिखी गई है। अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है, जवाब तो देना ही होगा!

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