महासमुंद (पटेवा):
सावधान! अगर आप सोचते हैं कि स्कूल सिर्फ बच्चों को क ख ग घ सिखाने की जगह है, तो पटेवा के श्रद्धा पब्लिक स्कूल आकर अपनी जनरल नॉलेज दुरुस्त कर लीजिए। यहाँ पढ़ाई हो न हो, लेकिन 'उगाही और ब्लैकमेलिंग' के विषय में स्कूल प्रबंधन ने पीएचडी कर रखी है! एक जागरूक पालक लोकेश कुमार साहू ने जब इस 'शिक्षा की दुकान' का शटर उठाने की कोशिश की, तो जो सच सामने आया है, उसने पूरे महासमुंद जिला कलेक्टर और डीईओ (DEO) दफ्तर की कुर्सियां हिला दी हैं।
चलिए, खोलते हैं इस 'स्कूल' के सस्पेंस का काला चिट्ठा!
🤫 फीस पूरी जमा, फिर भी 'बिल' का रहस्य क्या है?
कहानी में सस्पेंस देखिए। पालक लोकेश जी ने अपने बच्चे एकलव्य और भतीजी हिमांशी की पूरी मासिक फीस ईमानदारी से, टाइम पर जमा कर दी। जेब से पैसे गए, हाथ में पक्की रसीद आई। मामला यहीं खत्म हो जाना चाहिए था। लेकिन ट्विस्ट तब आया जब स्कूल प्रबंधन ने अपनी जेब का साइज छोटा पाया और मनमाने ढंग से एक नया 'रहस्यमयी बिल' थमा दिया!
जब पालक ने पूछा—"हुजूर, यह एक्स्ट्रा पैसा किस बात का?" तो आगे से जवाब मिला—"सवाल मत करो, सीधे कैश निकालो!" वाह भाई वाह! यह स्कूल है या किसी फिल्म के विलेन का अड्डा, जहां 'प्रबंधन' सीधे वसूली भाई के गेटअप में आ जाता है?
😡 खुली धमकी: "पैसा दो, वरना बच्चे का भविष्य,हमारे कब्जे में हैं!"
व्यंग्य की पराकाष्ठा देखिए, जब साहू जी ने फीस का सही हिसाब-किताब मांगा, तो स्कूल प्रबंधन ने उन्हें शिक्षा के दो नए नियम सिखाए—बदसलूकी और धमकी! खुलेआम कह दिया गया: “जितना बिल भेजा है, उतना पैसा जमा करो, वरना बच्चों के दस्तावेज (मार्कशीट/टीसी) रोक लिए जाएंगे।”
गजब है! इसे कहते हैं 'व्हाइट कॉलर ब्लैकमेलिंग'। छोटे-छोटे मासूम बच्चों के भविष्य और उनके कागजातों को स्कूल ने ऐसे 'बंधक' बना लिया है, जैसे कोई डाकू फिरौती के लिए इंसानों को पकड़ता है। शिक्षा का अधिकार? वो तो शायद स्कूल की लाइब्रेरी में किसी कोने में धूल खा रहा होगा!
🚌 ब्लैकबोर्ड गायब, बस बनी 'टाइम मशीन'—पालक ने खोली पोल!
लोकेश जी ने जब स्कूल की अव्यवस्थाओं का एक्स-रे किया, तो अंदर से जो सड़ांध निकली, उसे सुनकर आप दंग रह जाएंगे:
🔮 गायब ब्लैकबोर्ड का जादू:
पिछले सत्र में पूरे तीन महीने तक क्लास से ब्लैकबोर्ड ही गायब था! धन्य हो यह तकनीक! बिना बोर्ड के बच्चे हवा में पढ़ाई कर रहे थे या अंतर्यामी बन चुके थे, यह जांच का विषय है।
🕒 बस या 'भारत दर्शन'? 🚌
: छोटे-छोटे बच्चे सुबह 7 बजे घर से निकलते हैं और शाम 4 बजे वापस आते हैं। 9 घंटे! जितनी देर में इंसान रायपुर से नागपुर पहुंच जाए, उतनी देर में श्रद्धा स्कूल की बस बच्चों को पटेवा की गलियों में घुमाकर 'थकान का प्रैक्टिकल' करा रही है।
👨🏫 योग्य शिक्षक? वो क्या होता है!
स्कूल में योग्य शिक्षकों का ऐसा 'अकाल' पड़ा है कि बच्चों का भविष्य अंधकार में गोते लगा रहा है। हां, पालकों की बैठक कराने में भी इन्हें अपच होती है, साल में सिर्फ 3-4 बार ही चेहरा दिखाते हैं।
💡 'तीखी नज़र' की कड़क सलाह (पालकों और शिक्षा विभाग के लिए)
💥 शिक्षा विभाग (DEO) को हमारी नसीहत:
साहब! सूत्रों से पता चला है कि आपने 'जांच टीम' बनाने का मन बनाया है। लेकिन ध्यान रहे, यह जांच कछुए की रफ्तार से न चले, वरना तब तक चोर सिलेंडर लेकर..😜. सॉरी, स्कूल वाले बच्चों का भविष्य लेकर रफूचक्कर हो जाएंगे!
तुरंत 'तालाबंदी' की कार्रवाई हो:
जब तक जांच पूरी न हो, स्कूल के मैनेजमेंट को प्रशासनिक नियंत्रण में लिया जाए।
कैंप लगाकर दस्तावेज दिलाएं:
विभाग खुद स्कूल परिसर में बैठकर बच्चों की टीसी और मार्कशीट पालकों को सौंपे, ताकि इन 'वसूली भाईयों' का घमंड टूटे।
लाइसेंस रद्द करने का डंडा:
जो स्कूल बिना ब्लैकबोर्ड के बच्चों को पढ़ाए और गुंडों जैसी धमकी दे, उसकी मान्यता को तुरंत 'ब्लैकलिस्ट' की टोकरी में डाल देना चाहिए।
👨👩👦 पालकों को 'तीखी नज़र' की सीख:
भाइयों! बच्चों को ऐसे डरावने और शोषक माहौल में पढ़ाकर उनके हौसले मत तोड़िए। एकजुट होइए! लोकेश साहू जी की तरह अपनी आवाज बुलंद कीजिए। स्कूल को अपनी गाढ़ी कमाई की 'फिरौती' मत दीजिए। याद रखिए, अगर आज आप डर गए, तो कल ये आपके बच्चों के आत्मसम्मान को भी बंधक बना लेंगे!
निष्कर्ष:
अब देखना यह है कि महासमुंद का शिक्षा विभाग इस 'श्रद्धा' विहीन स्कूल पर अपना 'प्रशासनिक डंडा' कब चलाता है, या फिर यह मामला भी फाइलों के बोझ तले दबकर दम तोड़ देता है! रहवासी और पालक... नजर बनाए रखें!
☝️
प्रमाण आपके सामने: पालकों द्वारा महासमुंद कलेक्टर एवं जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) को सौंपी गई लिखित शिकायत की मूल प्रति (ओरिजनल कॉपी), जिस पर बकायदा पावती मुहर लगी हुई है। 'तीखी नज़र' के पास इसकी एक्सक्लूसिव कॉपी सुरक्षित है।"



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