उपाधि: 'साहब' को ज्ञापन का करंट लगा, तब जाकर याद आया कि पेड़ों की टहनियां भी काटनी हैं!
बागबाहरा
अगर आप बागबाहरा में रहते हैं और यह सोचते हैं कि बिजली गुल होने पर शिकायत केंद्र का नंबर अगर वो कभी लग जाए तो आपकी समस्या दूर कर देगा, तो हुजूर, आप मुगालते में हैं! हमारे बागबाहरा का बिजली विभाग इस वक्त 'परम शांति' और 'अघोषित मौन व्रत' के दौर से गुजर रहा है। जनता उमस और गर्मी में उबल रही है, लेकिन विभाग के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही।
आखिरकार, जनता के सब्र का बांध टूटा और सोमवार को पार्षदों का गुस्सा सीधे बिजली दफ्तर की चौखट पर जाकर फूटा।
📋 : जब 'सिस्टम' ही शॉर्ट-सर्किट हो जाए!
पार्षद रूपेश (प्रेम) साहू, थानूराम पांडे और पूर्व पार्षद लोकेश्वर चंद्राकर जब जनता के सब्र का घड़ा लेकर विद्युत विभाग के अधिकारी एल.आर. सिदार के केबिन में घुसे, तब जाकर साहब को पता चला कि बाहर की दुनिया में लोग बिना पंखे के कैसे तड़प रहे हैं! पार्षदों ने साफ शब्दों में कहा कि एक तरफ शासन विभाग को मजबूत करने के लिए पूरे संसाधन, गाड़ियां और तगड़ा फंड दे रहा है, तो दूसरी तरफ बागबाहरा की विद्युत व्यवस्था पूरी तरह 'लकवाग्रस्त' (चरमरा) चुकी है।
"तिखी नज़र का सीधा सवाल:
जब सरकार से मिलने वाली सुख-सुविधाओं और जनता से वसूलने वाले भारी-भरकम बिजली बिल में कोई कटौती नहीं है, तो फिर इस उमस भरी गर्मी में चौबीस घंटे कटौती का यह 'इनाम' बागबाहरा की जनता को ही क्यों?"
📞 फोन बजाओ, खुद को थकाओ!
शिकायत केंद्र की हालत यह है कि वहां फोन सिर्फ सजने के लिए रखा है। उपभोक्ता नंबर डायल करते-करते थक जाएं, पर मजाल है कि वहां बैठा कोई कर्मचारी फोन उठाकर तसल्ली के दो बोल बोल दे। ऐसा लगता है कि कर्मचारियों को फोन उठाने से 'एलर्जी' हो गई है। जब फोन ही नहीं उठेगा, तो साहब की डायरी में शिकायत दर्ज कैसे होगी? और जब शिकायत दर्ज नहीं होगी, तो साहब बड़े गर्व से कहेंगे "हमारे इलाके में तो सब चंगा सी "
🌳 'टहनियों' के पीछे छिपता विभाग का आलस
जब पार्षदों ने साहब को घेरकर ज्ञापन थमाया, तब जाकर साहब की तरफ से एक सदाबहार आश्वासन का 'लॉलीपॉप' बाहर आया। अधिकारी सिदार जी ने बड़े भरोसे के साथ कहा है कि
"जल्द ही मेंटेनेंस शुरू होगा और लाइनों के पास की पेड़ों की टहनियां काटी जाएंगी, ताकि हवा -तूफान में फॉल्ट न हो।"
अब तिखी नज़र इस पर कड़ा ऐतराज जताती है:
- साहब! जून का महीना आ गया, धूप और उमस से जनता का बुरा हाल है, और आपका 'मेंटेनेंस' अब शुरू होने जा रहा है? यह काम तो मार्च-अप्रैल में हो जाना चाहिए था!
- बिना आंधी-तूफान के, जब आसमान बिल्कुल साफ रहता है, तब जो दिन में दस बार बिजली 'आंख-मिचौली' खेलती है, तब कौन से पेड़ की टहनी आकर तारों को छू लेती है ?
👀 तिखी नज़र का अंतिम निचोड़
बागबाहरा की जनता अब आश्वासन की घुट्टी पीकर थक चुकी है। पार्षदों ने तो अपना फर्ज निभाकर साहब को जगाने की कोशिश कर दी है। अब देखना यह है कि अधिकारी सिदार साहब की यह 'मेंटेनेंस एक्सप्रेस' सचमुच पटरियों पर दौड़ती है या फिर हमेशा की तरह अगली बार भी बिजली गुल होने का ठीकरा किसी बेकसूर पेड़ की टहनी पर ही फोड़ दिया जाएगा।
बिजली विभाग के बाबू लोग कान खोलकर सुन लें—जनता की बर्दाश्त की भी एक वोल्टेज सीमा होती है, अगर वो हाई हुई तो पूरा सिस्टम संभालना भारी पड़ जाएगा!

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