रायपुर/सीतापुर (विशेष प्रतिनिधि)।
छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक नया 'योगासन' ट्रेंड कर रहा है, जिसे "कलम छोड़ो, कुर्सी बचाओ" आसन कहा जा रहा है। मामला सरगुजा के सीतापुर से शुरू हुआ, जहाँ हमारे माननीय विधायक जी ने जनता की सेवा करते-करते अचानक "त्वरित न्याय" (Instant Justice) की थ्योरी अपना ली।
सूत्रों के मुताबिक, विधायक जी को लगा कि फाइलें आगे बढ़ाने में नायब तहसीलदार की कलम बहुत धीमी चल रही है, इसलिए उन्होंने 'फिजिकल एफिशिएंसी' बढ़ाने के लिए खुद ही हाथ बढ़ा दिया। अब इसे विधायक जी का प्रशासनिक सुधार कहें या 'हाथ-परिवर्तन' अभियान, तहसीलदार संघ को यह बात रास नहीं आई।
तहसीलदारों का कहना है, "हम जमीन का नाप-जोख करते हैं, लेकिन विधायक जी ने तो सीधे हमारा ही 'नाप' ले लिया!" जवाब में राजस्व अधिकारी अपनी सबसे घातक मिसाइल लेकर युद्ध मैदान में उतर आए हैं— "पेन-डाउन हड़ताल"।
आज आलम यह है कि पूरे प्रदेश की तहसीलों में ऐसी शांति है जैसी किसी पुस्तकालय में भी नहीं होती। बाबू लोग कंप्यूटर स्क्रीन पर 'रिफ्रेश' बटन दबाकर देश सेवा कर रहे हैं और तहसीलदार साहब न चाय की चुस्कियों के साथ 'प्रशासनिक गरिमा' पर शोध कर रहे हैं। जनता बेचारी नामांतरण और आय प्रमाण पत्र के चक्कर में तहसीलों के चक्कर काट रही है और सोच रही है कि काश! विधायक जी ने हाथ की जगह सिर्फ ज़ुबान चलाई होती।
✍️ चटकारेदार व्यंग्य: "जब 'माननीय' और 'मातहत' का आमना-सामना हुआ"
हमारे देश में नेताओं की एक बड़ी पुरानी शिकायत रही है कि 'ये ब्यूरोक्रेसी काम नहीं करने देती'। लेकिन सीतापुर के माननीय विधायक जी ने इस समस्या का ऐसा 'ऑन-द-स्पॉट' समाधान निकाला कि न्यूटन का गति का तीसरा नियम भी शर्मा जाए।
विधायक जी का मानना रहा होगा कि लोकतंत्र में 'जनता का प्रतिनिधि' सर्वोपरि होता है। अब सर्वोपरि व्यक्ति अगर किसी छोटे-मोटे नायब तहसीलदार को थोड़ा 'स्पर्श' भी कर दे, तो उसे आशीर्वाद समझना चाहिए। लेकिन ये कलयुग के अधिकारी हैं, आशीर्वाद को 'दुर्व्यवहार' समझ बैठे और अपनी कलम की स्याही सुखाकर बैठ गए।
"विधायक जी ने सोचा था कि थोड़ा रौब दिखाएंगे तो फाइलें रॉकेट की स्पीड से दौड़ेंगी, पर यहाँ तो रॉकेट का ईंधन (स्याही) ही गायब हो गया!"
इस पूरे घटनाक्रम से जो सबसे खूबसूरत बात निकलकर सामने आई है, वह है हमारी प्रशासनिक व्यवस्था की एकता।
वैसे तो एक तहसीलदार दूसरे तहसीलदार से मिलने के लिए अपॉइंटमेंट मांगता है, लेकिन जैसे ही बात 'मान सम्मान' पर आई, 146 तहसीलों के अधिकारी ऐसे एक हो गए जैसे फेविकोल का मजबूत जोड़ हो।
अब सरकार के सामने धर्मसंकट
एक तरफ 'माननीय' हैं जो चुनाव जिताकर लाते हैं, दूसरी तरफ 'मातहत' हैं जो सरकार की योजनाएं जमीन पर चलाते हैं। जनता बीच में खड़ी होकर सोच रही है कि:
अगर नेताजी हाथ उठाएंगे, तो काम कौन करेगा?
और अगर अफसरशाही पेन उठाना बंद कर देगी, तो सुशासन का पहिया कैसे चलेगा?
जनता का नाम लेकर कानून हाथ में लेने की "इमरजेंसी" आज़ादी किसी को नहीं!
जनता के नाम पर सियासत करना पुराना दस्तूर है, लेकिन जनता की दुहाई देकर कानून को सरेआम हाथ में लेना, यह कैसी "जनता की सेवा" है? सीतापुर का कथित वाकया महज़ एक विधायक और एक अफसर की लड़ाई नहीं है, यह सीधे तौर पर हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं के इक़बाल पर चोट है।
🧑⚖️ माननीय विधायक जी के लिए कड़क सन्देश:
विधायक जी, आपको जनता ने वोट दिया है, 'पावर ऑफ़ अटॉर्नी' नहीं!
आप कानून बनाने वाली संस्था के सदस्य हैं, न कि ख़ुद 'कानून' और 'न्यायाधीश' दोनों। अगर आपको प्रशासनिक सुस्ती या अधिकारी के रवैये से शिक़ायत थी, तो आपके पास विधानसभा से लेकर सचिवालय तक और पार्टी के आलाकमान तक गुहार लगाने के दर्जनों संवैधानिक और शांतिपूर्ण रास्ते मौजूद थे। 'फिज़िकल जस्टिस' (physical justice) यानी मारपीट या दुर्व्यवहार का रास्ता अख्तियार करना महज़ एक अलोकतांत्रिक आचरण नहीं है, बल्कि यह उस पद की गरिमा के भी ख़िलाफ़ है जिस पर आप बैठे हैं। यह न भूलें कि "जनता का गुस्सा" सियासत में दोधारी तलवार है; आज अफसर पर फूटा है, कल नेता पर भी फूट सकता है। कानून को अपनी जागीर समझने की भूल भारी पड़ सकती है।
👥 तिखी नज़र का जनता को तीखा सलाह
ऐ "भोली" जनता! कब तक नेताओं के 'इमोशनल अत्याचार' का शिकार बनोगी?
अधिकारियों की सुस्ती और भ्रष्टाचार से आपकी परेशानी जायज़ है, लेकिन क्या विधायक जी का यह 'गुंडागर्दी' वाला तरीक़ा आपकी समस्याओं का स्थायी समाधान है? या फिर यह महज़ अपनी 'पॉलिटिकल धौंस' जमाने का एक और सियासी ड्रामा?
याद रखें, जब नेता और अफसर आपस में लड़ते हैं, तो सबसे ज़्यादा नुक़सान आपका होता है—नामांतरण अटकता है, रजिस्ट्री रुकती है, आपके काम ठप होते हैं।
सलाह यही है:-
बहकावे में न आएं: ऐसे नेताओं का समर्थन कतई न करें जो 'जनता के नाम पर' हिंसा को जायज़ ठहराते हैं।
जवाबदेही मांगें: जब भी ऐसी घटना हो, अपने नेता से पूछें कि उन्होंने 'कानूनी रास्ते' क्यों नहीं आज़माए?
असली मुद्दों पर टिके रहें: नेताओं की इस 'तू-तू, मैं-मैं' में अपने असली मुद्दे—भ्रष्टाचार, काम में देरी—को न खोने दें।
सियासी सबक :-
लोकतंत्र को 'थप्पड़' और 'हड़ताल' से नहीं, बल्कि 'क़ानून' और 'संवाद' से चलना चाहिए। जब जनप्रतिनिधि ही कानून को लात मारेंगे, तो आम आदमी को कानून का पालन करने की सीख कौन देगा?

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